Friday, August 21, 2009

आह्! तिरंगा, वाह तिरंगा...

"असली भारत" आज अकेला
ढूंढ रहा है कहां तिरंगा?
आह्! तिरंगा, वाह तिरंगा...

नारंगी उस रंग का मतलब
जो था हमको गया बताया
भ्रष्ट हुआ ईमान घूमता
धन का रंग है सब पर छाया
देश प्रेम का भाव घट रहा,
चिंतन घूम रहा बेढंगा..
आह्! तिरंगा, वाह तिरंगा...


ध्वल सफेदी का संदेश,
आज भला हम किस्से पूछें?
जिसको देखों अकड रहा है
और पनाता अपनी मूंछें
ज्ञान धूप में रिक्शा खींचे.
लूट का पैसा बढता चंगा..
आह्! तिरंगा, वाह तिरंगा...


हरियाली पथरीली बनती
ताड सरीखी उगी इमारत
भाई चारा गया भाड में
खूनी होती गई इबादत
आजादी का मक्खन निकला
और विकास का रंग दुरंगा.
आह्! तिरंगा, वाह तिरंगा...
एक किनारा उधर बढा है
एक खाई नित होती गहरी
एक की मनचाही सब बातें
एक की जीवन रेखा ठहरी
एक के हाथों खूब कचौडी
और एक है घूमे नंगा.
आह्! तिरंगा, वाह तिरंगा...


सच का मतलब शीना-जोरी
पछतावे के बंद रिवाज
स्वच्छंदता नित बढती ऐसे
जैसे बढे कोढ में खाज
आस्तीन जिनका घर होता
उनके शीने सजा तिरंगा.
आह्! तिरंगा, वाह तिरंगा...


वह रंगों की बात करेगा
जो बेमेहनत धन पा जाए
उसको क्या रंगो से लेना
भूख में जो पत्थर खा जाए
खुशहाली के रंग अनेकों
पर दुख होता है बेरंगा
आह! तिरंगा, वाह तिरंगा...
 
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