Wednesday, March 14, 2007

मजाक की भी कोई हद होती है?

मजाक मजाक में लोग जाने क्या क्या कह जाते हैं. मजाक हो गया है मजाक करना. हर कोई मजाकिया बनने चला है. लेकिन सच कहता हूं. मां कसम मजाक पर पाबंदी लगनी चाहिये. जी हां पाबंदी. मजाक खुले में धडल्ले से यूं चल रहा है जैसे कोई देशी शराब बिक रही हो? जब हर चीज ब्रांडिड होती जा रही है तो मजाक का भी ब्रांड तय होना चाहिये. बडे बडे शोरूम में टैग लगे लिफाफों में बिकने चाहिये मजाक के पैकेट. हद है साहब. किसी पर भी मजाक? कई सारे कवि हैं हरियाणा के लोगों पर मजाक लिख लिख कर बहुत बडे मजकिये बने फिरते हैं. एक सहाब है हमेशा बीवी को लेकर मजाक करते है. भला बीवी पर इस तरह सार्वजनिक रूप से मजाक बनाना सही है क्या? मेरी यदि चलती तो मैं उन्हें घरेलू हिंसा के आरोप में अंदर करवा देता. पर हमें क्या अपनी बीवी का ही तो मजाक बनाते हैं बनाए , लाख बनाए, जिसदिन किसी और की बेवी का मजाक बनाऐंगे उस दिन पता चलेगा मियां को. टी.वी. वालों के सर भी मजाक उडाने का भूत सवार है. देश के सारे नेताऔं का मजाक बना रखा है. लाफ्टर पर गला फाड फाड कर हंस रहे हैं सिद्धू और शेखर सुमन. सच कहता हूं पूरे शो को देख कर कोई नही हसता. चाहे आप भी कोशिश करके देख लेना. यदि बहुत जोर लगा कर भी आप हंस सको तो कहना? मेरे एक दोस्त ने लगातार सवा महीने कोशिश की पर हंस नहीं सका. रोज लाफ्टर के प्रोग्राम देख कर जब परेशान हो गया तो मेरे पास आया. बोला भाई लाफटर चैलेंज में चैलेंज क्या है? हंसना या हंसाना? मैंने उत्तर दिया. हंसना! . दोस्त ने जिज्ञाशु की तरह प्रशन किया - सिद्धू को हंसी क्यों आती है? मैंने कहा उसे हंसने के पैसे मिलते है. ऐसे सभी हंसी के प्रोग्रामों की खाशियत यही है कि जो हंसाते हुए दिखते हैं उन्हें भी और जो हंसते हुए दिखते हैं उन्हें भे सब को पैसे मिल रहे होते है. वरना भूखे पेट कोई माई का लाल नही हंस सकता क्योंकि भारत के गरीबों जैसा सेंस आफ ह्यूमर किसी के पास नही. एक गरीब ही है जो एक वक्त की रोटी खा कर भी खुल कर हंस लेता है. बात तो मजाक से शुरू हुई थी जनाब और जाने कहां भूख की देहरी पर जा पहुंची. पर बात यहां भी मजाक का ही है साहब, देश की समस्याऔं का लोगों ने मजाक बना रखा है. आए दिन लोग गरीबी, भुखमरी, बीमारी, बेरोजगारी, भ्रस्टाचार को लेकर धरने पर्दशन करते है. सबने धरने पर्दशन को मजाक बना रखा है. इस देश में मजाक बनाने के ऊपर भी धरने पर्दशन होने शुरू हो गये है. संता बंता से लोग चिढ गये है. मजाक की भी कोई हद होती है भला? सारी जमात ने झंडे हाथ में ले लिये है. खबरदार जो हमारा किसी ने मजाक उडाया .....

दौर देखिये कैसा आया, वो आब-ओ-दाना भूल गये
मेरे मोहल्ले वाले अब तो मुस्कुराना भूल गये.

गुलगुली से भी अब बच्चे हंसते नहीं चिल्लाते हैं,
टानिक शीशी से पीते है, वो खिलखिलाना भूल गये.

योगेश समदर्शी

7 comments:

आशीष said...

क्या मजाक है ये पोष्ट भी !

masijeevi said...

हे हे
बड़े मजाकिया हैं आप ;)

अनूप शुक्ला said...

अच्छा मजाक है!

सागर चन्द नाहर said...

मजाक की भी कोई हद होती है!! :):)

॥दस्तक॥

Mrinal Kant (मृणाल कान्त) said...

बढ़िया पोस्ट है

Shrish said...

योगेश जी पहली बार ध्यान से आपकी पोस्ट पढ़ने को मिली और बहुत अच्छी लगी। व्यंग्य के द्वारा खूब प्रहार किए आपने नकली हंसी वालों पर।

संजय बेंगाणी said...

मजाक मजाक में टिप्पीया दिये है, मजाक में ही लें.
आपने भी खुब व्यंग्य किया मजाक मजाक में.

 
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